Tuesday, May 22, 2012

आत्मा और शरीर




चलो फिर!

तुम तो जाकर लग जाओगी,
एक कतार में,
अपने क्रम के इंतज़ार में,
मुझे तो तय करना है,
एक लम्बी... सी दुरी.

बनुंगा किसी का निवाला,
कुछ खुन की बूंदें,
फिर फेंक दिया जाऊंगा,
शेष जमीं पे,
शायद फिर से निवाला,
और फिर से जमीं पे.

अनंत क्षुधाओं को तृप्त कर,
मिट्टी में मिल जाऊंगा,
तुम जा रही हो, जाओ,
तुम बिन मैं एक निवाला रह जाऊंगा.

चलो फिर!

Sunday, November 27, 2011

कुछ अपना सा


तुम चले गए,
कोई बात नहीं,
रहते भी यहाँ,
तो कोई बात नहीं.

कोई बात हीं नहीं,
तो क्या बात हो?
कोई बात भी हो,
तो क्या बात हो?

क्यूँ जीभ को नाचना,
क्यूँ साँस को भागना,
क्यूँ दांत को दिखाना,
क्यूँ कंठ को जगाना?

वैसे रुक जाते तो ठीक था,
आज आंखें नम न होतीं,
चले भी गए तो ठीक हीं है,
उदासी हीं सही, कुछ अपना सा है.

Saturday, July 23, 2011

एक सवाल




जिस से मिलो, वही बन जाते हो,
और जब सब मिल जाते तो तुम आ जाते हो.
सब में तुम्ही हो, और तुममे सभी हैं,
सफ़ेद रंग हो या भगवान ?

Wednesday, January 26, 2011

हम मनचले

हम मनचले,
सिर्फ मन की सुनते हैं,
और मन की हीं करते हैं.

वहीँ चले जाते, जहाँ मन ले जाए.
वही अपना ठिकाना, जहाँ मन ठहर जाए.
गीत वही गाते, जो मन गुनगुनाये.
रित वही अपनी, जो मन को भा जाये.

हमे नहीं आता बाते बनाना.
परदे लगाना और सच को छुपाना
मीठी-मीठी बातों से ठगना- ठगाना.
रसगुल्ले के बिच में मिर्ची दबाना.

हम मन के हैं साफ, बातें करते बेबाक.
न उंच नींच का भेद, न शातिर जज्बात.
बढाते हैं भाईचारा, बांटते हैं प्यार.
ऐसा ही है हमारा मनचला संसार.

हम मनचले,
हम फुल भी हैं और तलवार भी हैं,
हम कल भी थे और आज भी हैं.

Wednesday, September 8, 2010

दीया तले अँधेरा


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तु प्रचंड रौशनी है,
और मैं घनघोर अँधेरा,
जहाँ तेरा अस्तित्व ना हो,
वहीँ मेरा बसेरा.

ये असंभव मेल भी है संभव,
अगर तु सिमट जरा,
तु बन जा टिमटिमाती दीया,
और मैं तेरे तले अँधेरा.
हमेशा हमेशा के लिए.

Saturday, July 3, 2010

अस्तित्व


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दो चलते हुए खंभे,
उसके उपर एक ट्रांसफ़ॉर्मर,
उसके उपर पांच किलो का एक सुपर कम्प्युटर.
चलती है साँस तो मै मै हुं .
जो रुक गयी साँस तो मै कौन हुं ?

कुछ मछलियों का भोजन,
या एक हंडी बुझी हुई राख,
या पत्थर के बोझ से दबी,
जमीं से तीन फीट नीचे कुछ हड्डियाँ ?

या फिर डाइनिंग हॉल की दिवाल पे,
फोटो फ्रेम में कैद,
सफ़ेद मूंछे फहराते,
दो गज की पगड़ी में,
जकड़ा एक चेहरा ?

Monday, June 14, 2010

किनारा





मन उदास है,
तु जो न पास है.

तेरे ही आसरे,
चले आये किनारे.
मन तुझे हीं पुकारे.
ढूंढे तेरे सहारे.

चली आ, चली आ.
मन उदास है,
तु जो न पास है.

छुप गयी हो कहाँ,
कुछ इशारा तो दो,
कोई निशानी तो दो.
क्यूँ हो खफा,
ऐसी क्या है खता,
जो तेरी एक दरस को,
इतना तडपे हम.
तेरी हीं खोज में,
बावरा ये मन.

चली आ, चली आ.
मन उदास है,
तु जो न पास है.

मन उब रहा है,
इन लहरों से बातें करके,
बादलों में तुझे ढुंढते,
तेरी राह तकते.
अब तो ये भी मुझपे हंसते,
और कहते,
तु नहीं आएगी.
रह गया हुं अकेले,
चली आ चली आ.

मन उदास है,
तु जो न पास है,
चली आ चली आ.