Tuesday, July 4, 2017

ईश्वर और दोस्ती


ईश्वर को मानते हो?
मेरे मानने या न मानने से उसके होने या न होने का कोई सम्बन्ध नहीं है
सीधा बोलो
बिलकुल सीधा बोल रहा हूँ
और बोलो
कबीर ने कहा था,
"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि |
ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही |
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय |
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय | "
मतलब ?
भला, बुरा, भगवान, शैतान जो भी ढूँढो, सब तुम्हारे अंदर है
फिर तो मानने या न मानने से फर्क पड़ता है?
वो तो है
घुमा के क्यों बोले?
आदत है, मगर तुम सीधा समझी
अच्छा, दोस्ती में यकीन रखते हो?
मेरे यकीन रखने या न रखने...
तुम रहने दो |

Tuesday, May 22, 2012

आत्मा और शरीर




चलो फिर!

तुम तो जाकर लग जाओगी,
एक कतार में,
अपने क्रम के इंतज़ार में,
मुझे तो तय करना है,
एक लम्बी... सी दुरी.

बनुंगा किसी का निवाला,
कुछ खुन की बूंदें,
फिर फेंक दिया जाऊंगा,
शेष जमीं पे,
शायद फिर से निवाला,
और फिर से जमीं पे.

अनंत क्षुधाओं को तृप्त कर,
मिट्टी में मिल जाऊंगा,
तुम जा रही हो, जाओ,
तुम बिन मैं एक निवाला रह जाऊंगा.

चलो फिर!

Sunday, November 27, 2011

कुछ अपना सा


तुम चले गए,
कोई बात नहीं,
रहते भी यहाँ,
तो कोई बात नहीं.

कोई बात हीं नहीं,
तो क्या बात हो?
कोई बात भी हो,
तो क्या बात हो?

क्यूँ जीभ को नाचना,
क्यूँ साँस को भागना,
क्यूँ दांत को दिखाना,
क्यूँ कंठ को जगाना?

वैसे रुक जाते तो ठीक था,
आज आंखें नम न होतीं,
चले भी गए तो ठीक हीं है,
उदासी हीं सही, कुछ अपना सा है.

Saturday, July 23, 2011

एक सवाल




जिस से मिलो, वही बन जाते हो,
और जब सब मिल जाते तो तुम आ जाते हो.
सब में तुम्ही हो, और तुममे सभी हैं,
सफ़ेद रंग हो या भगवान ?

Wednesday, January 26, 2011

हम मनचले

हम मनचले,
सिर्फ मन की सुनते हैं,
और मन की हीं करते हैं.

वहीँ चले जाते, जहाँ मन ले जाए.
वही अपना ठिकाना, जहाँ मन ठहर जाए.
गीत वही गाते, जो मन गुनगुनाये.
रित वही अपनी, जो मन को भा जाये.

हमे नहीं आता बाते बनाना.
परदे लगाना और सच को छुपाना
मीठी-मीठी बातों से ठगना- ठगाना.
रसगुल्ले के बिच में मिर्ची दबाना.

हम मन के हैं साफ, बातें करते बेबाक.
न उंच नींच का भेद, न शातिर जज्बात.
बढाते हैं भाईचारा, बांटते हैं प्यार.
ऐसा ही है हमारा मनचला संसार.

हम मनचले,
हम फुल भी हैं और तलवार भी हैं,
हम कल भी थे और आज भी हैं.

Wednesday, September 8, 2010

दीया तले अँधेरा


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तु प्रचंड रौशनी है,
और मैं घनघोर अँधेरा,
जहाँ तेरा अस्तित्व ना हो,
वहीँ मेरा बसेरा.

ये असंभव मेल भी है संभव,
अगर तु सिमट जरा,
तु बन जा टिमटिमाती दीया,
और मैं तेरे तले अँधेरा.
हमेशा हमेशा के लिए.

Saturday, July 3, 2010

अस्तित्व


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दो चलते हुए खंभे,
उसके उपर एक ट्रांसफ़ॉर्मर,
उसके उपर पांच किलो का एक सुपर कम्प्युटर.
चलती है साँस तो मै मै हुं .
जो रुक गयी साँस तो मै कौन हुं ?

कुछ मछलियों का भोजन,
या एक हंडी बुझी हुई राख,
या पत्थर के बोझ से दबी,
जमीं से तीन फीट नीचे कुछ हड्डियाँ ?

या फिर डाइनिंग हॉल की दिवाल पे,
फोटो फ्रेम में कैद,
सफ़ेद मूंछे फहराते,
दो गज की पगड़ी में,
जकड़ा एक चेहरा ?

Monday, June 14, 2010

किनारा





मन उदास है,
तु जो न पास है.

तेरे ही आसरे,
चले आये किनारे.
मन तुझे हीं पुकारे.
ढूंढे तेरे सहारे.

चली आ, चली आ.
मन उदास है,
तु जो न पास है.

छुप गयी हो कहाँ,
कुछ इशारा तो दो,
कोई निशानी तो दो.
क्यूँ हो खफा,
ऐसी क्या है खता,
जो तेरी एक दरस को,
इतना तडपे हम.
तेरी हीं खोज में,
बावरा ये मन.

चली आ, चली आ.
मन उदास है,
तु जो न पास है.

मन उब रहा है,
इन लहरों से बातें करके,
बादलों में तुझे ढुंढते,
तेरी राह तकते.
अब तो ये भी मुझपे हंसते,
और कहते,
तु नहीं आएगी.
रह गया हुं अकेले,
चली आ चली आ.

मन उदास है,
तु जो न पास है,
चली आ चली आ.

Friday, May 14, 2010

खिड़की के ओट से



कोई तो छुपा है,
खिड़की से ओट लेकर,
और गाड़े हुए है,
अपनी नज़रें मुझपर.

या ये मेरा ख़याल है,
जो पहुँच गया वहां,
ओढ़ ली आकृति,
और रखने लगी है मुझपे हीं नज़र.

मन तो होता है,
झांक लू खिड़की से
और जान लूँ , कि सच क्या है.
फिर सोचता हूँ,
कोई भी हो, क्या फर्क पड़ता है?
करता तो मैं वही हूँ, जो मन होता है.
अरे! कोई तो है जो
मुझे घर में होने का एहसास दिला जाता है.

वर्ना ये घर हीं क्यूँ?

Monday, May 3, 2010

एक अच्छी तराजू तो देना था न पापा





ग्राहक बदल गए, सामान बदल गए,
दूकान भले हीं पुरानी सौंप दी, लेकिन
एक अच्छी तराजू तो देना था न पापा!

कुछ सामान तो तराजू में आते ही नहीं,
कुछ आ भी गए तो इतने भारी,
कि अगर उसके भार का बटखरा रख दूँ ,
तो ये तराजू भी टूट जाए.

नए तो दूर, अब पुराने ग्राहक भी नहीं आते,
जो एक दो आ गए, उनको बिन तौले हीं
मुफ्त में बाटने पड़े सारे सामान.
बच गया मै और आपकी ये दुकान.
और हाँ, ये बिच में लटकती तराजू.

Wednesday, March 31, 2010

हाँ चलो




यदा कदा या सर्वदा,
यहाँ वहाँ या सारा जहाँ ,
कुछ फूलों में या सारी क्यारी में...

क्या?

तुम्हारा एहसास, तुम और तुम्हारी खुशबु...

मतलब?

तुम नहीं समझोगी, शायद समझना भी नहीं चाहती....

ऐसे कैसे?

बस ऐसा ही है,
तेरे में कोई बात है जो तुझे नहीं मालूम...

आगे मै कह देती हूँ,
मै हीरा और तुम जौहरी, और हीरे की पहचान सिर्फ जौहरी को होती है, है ना?


नहीं, हीरा तो पत्थर है और तुम मोम,
लेकिन पिघल मै रहा हूँ तुम्हारी याद में.

चल हट, बाते बनाना तो कोई तुमसे सीखे,

और दिल जलाना तुमसे...

खुल के कहो

तो ये लो...
तुने जो हंसाया कोई और क्या हंसायेगा,
एक बार जो आ गया, वो लौट कर क्या जायेगा.
अंधी है तू जो तुझे दिखाई नहीं देता,
अब मेरा प्यार तुझे संजय ही दिखायेगा.

हम्म, तो ये बात है, लेकिन मैंने तो तुम्हे उस नज़र से कभी देखा ही नहीं

मैंने तो एक नज़र भर के भी नहीं देखा,
फिर भी इन आँखों को सिर्फ तुम हीं दिखती हो....

हम्म, अब समझ में आ रहा है..

क्या?

वही, मै, मेरा एहसास और मेरी खुशबु...

फिर, तुम क्या कहती हो?

सच कहूँ या झूठ?

तुम्हारी हर बात मुझे सच्ची लगती है....

तो सुनो,
तुम हो बहुत भोले, जो इतना भी नहीं समझते,
बरसते हुए बादल, शायद ही कभी गरजते,
बयां कर जाते बहुत कुछ, मगर कभी कुछ ना कहते.
तुम्हारी हर छोटी छोटी बात, और हर एक बात मुझे बहुत ही भाती है,
ऐसा कोई पल नहीं, जिसमे तुम्हारी याद नहीं आती है.
इतने शांत होकर भी इतने नटखट हो,
कभी एकदम बुज़ुर्ग तो कभी बच्चे हो,
लगते बहुत अच्छे हो, मगर एक ही शिकायत है,
कभी अपनी उम्र भी जी लो...


ऐसा क्या?

हाँ..

तो चलो आज,
तुम्हे बाँहों में भर,
जन्नत की शैर कर आयें,
कुछ अधजलों को पूरा जला आयें,
जमीं पे उड़, हवा में तैर आयें,
पानी पे चलें और तेरी आँखों में डूब जायें.
तेरी आँखों में डूब जायें.

हाँ चलो...

Monday, March 29, 2010

कल और आज

कल तक जो बाहें कस लेती थी मुझे, आज क़त्ल करने को बेताब है,
कल जिन बातों में इतनी नमी हुआ करती थी, आज भर गयी उनमे आग है.
कल तक जो मोहब्बत की अलाप करते थे , आज उनके जुबान पे नफरत की राग है,
कल और आज में इतना ही फर्क है तो कैसे कह दूँ कल जन्नत था तो आज अभिशाप है.

Tuesday, January 19, 2010

कोशिश

हवा से तेज़ भागती जिंदगी,
न जाने कितने ही चहरे रोज़ दिखते हैं.

चमक रहे हैं उस सख्स के दांत,
और बिच में लहलहाती जीभ.
बैठा था मेरे बगल वाली सीट पर,
मै खिड़की से बहार झांकते,
वादियों में खोया हुआ बोल पड़ा था ख़ुद से,
प्यार जब पहला प्यार बन जाये तो,
समझ लेना गिनती शुरू हो गयी है,
और उसने फब्बारों से भींगा दी थी मेरी क़मीज |

आकर धुप वाली खिड़की पर बैठ गया,
बाहर स्कूटर पर पीछे बैठा एक,
इससे भी ज्यादा खुश सख्स दिख गया,
निचे उसकी ख़ुशी का कारन भी दिख गया.
हाँथ में मुह के बल लटका मुर्गा.
कितना अंतर था दोनों में -
एक सीधा तो दूसरा उल्टा,
एक ढंका तो दूसरा नंगा.
ज़िन्दगी, एक की हकीकत तो दुसरे के सपने,
एक काटने तो दूसरा कटने.
एक ही समानता थी-
दोनों के मुह में पानी था.

सवाल ये है कि, ये सब अचानक याद कैसे आये.
तुम्हे भुलाने की कोशिश है, इतना भी नहीं जानती !

Thursday, December 24, 2009

Eternal Wait

Another year gone by
and I kept waiting
for her to come
and discover hidden me.

Sometimes I feel her breath,
get touched by her warmth,
still to happen when I hug her with my full arms.
closing our eyes,
feeling the world under our feet,
and flying high in the sky,
together, holding tight.

I saw her once, approaching me,
and disappearing,
leaving me alone and wondering,
where she came from and where she went to.

May be she wanted me to follow her,
But I, the laziest arse around, chose to wait for her to come back.


Like my love and hope, my wait is also eternal,
I am still waiting......

Sunday, December 20, 2009

कल्पना या हक़ीकत

तु कल्पना है या हक़ीकत, मै तो बस बहे जा रहा हूँ.
ना सुध है ख़ुद की ना हीं जमीं की, मै बिन पंख उड़े जा रहा हूँ.

बांध ले अपनी डोरी से बना ले मुझे पतंग.
इस बेढंगी जिंदगी को देदे नए ढंग.
तु नहीं तो कोई और नहीं, तेरी डोर नहीं तो कोई डोर नहीं.
उड़ता हीं रहूँगा इसी तरह.

तु कल्पना है या हक़ीकत, मै तो बस बहे जा रहा हूँ.
ना सुध है ख़ुद की ना हीं जमीं की, मै बिन पंख उड़े जा रहा हूँ.

बचपन से मै तुमसे बातें करता आ रहा हूँ.
अंधियारे में तेरा साया तकता आ रहा हूँ.

इस उदास मन को तु देदे नए उमंग.
ठहरे हुए पानी में लहरा दे तरंग.
तु नहीं तो कोई और नहीं, ख़ुद से आना कोई ज़ोर नहीं.
राहें देखता हीं रहूँगा इसी तरह.

तु कल्पना है या हक़ीकत, मै तो बस बहे जा रहा हूँ.
ना सुध है ख़ुद की ना हीं जमीं की, मै बिन पंख उड़े जा रहा हूँ.

Friday, November 13, 2009

लाइफ झंड बा, फिर भी घमंड बा.

दिन भर काम,
ऑफिस आने जाने में ट्रैफिक,
गाडियों की हौं पौं,
ऊपर से इतना धुआं और धुल...

कुर्सी पे बैठे बैठे,
तन से ज्यादा मन थका हुआ,
किबोर्ड की ठक ठक,
और आँखे सिर्फ कंप्यूटर पे...

नोट तो कमाए,
लेकिन आनंद उठाये, इसके लिए न वक़्त है न शारीर में उर्जा.
फिर भी एक बात कहेंगे भैया,
लाइफ झंड बा, फिर भी घमंड बा.

बुराई

कबीर जी ने कहा -

बुरा जो देखन मै चला , बुरा न दिखा कोय.
जो दिल ढूंढा अपनों , मुझसे बुरा न कोय.


आजकल की जनता -

बुरा जो देखने मै निकला,
हर एक चीज में बुराई पाया.
लोग कहते हैं भगवान परफेक्ट हैं ,
मै कहता हूँ कि उनकी यही बुराई है कि उनमे बुराई नहीं.

Sunday, August 9, 2009

सवंरिया बादल बन के आ

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बादल बन के आ सवंरिया, बादल बन के आ.
बादल क घोड़वा, बदले का दुलहा.
बरसा द पनिया का फुलवा, सवंरिया बादल बन के आ.

तोरी कनिया पियासल बैठल है.
सावन महिना तोहरे बिन तरसल है.
कईसे जिहें तोहार पुतवा, सवंरिया बादल बन के आ.

सावन महिना बीत गईल, जोहत जोहत बाट.
अब कबले अईब तू सजना, जब उठ जई हमार खाट.

सवंरिया बादल बन के आ.

Saturday, June 27, 2009

जीभ की नमीं

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दादाजी ने कहा था -
" जीभ की नमीं बनाये रखना.

जीभ में नमीं हो, तो हर बात में नमीं हो.
मुस्कान में नमीं हो, जज्बात में नमीं हो.

जैसे नम जमीं, पेंड पौधे की जड़ को शितलता देते हैं और वो फल फुल उठते हैं और एकदम हरे भरे खिलखिलाते रहते हैं.
वैसे हीं अगर बात में नमीं हो तो लोगो का मन शितल होता है और वो बहुत खुश और खिलखिलाते रहते हैं."

हाय रे दुर्भाग्य!
Global warming की वजह से नमी बनाये रखना कितना मुश्किल हो गया है.
सोचता हूँ, मेरा Boss इतना झुंझलाया हुआ कड़वा क्यूँ बोलता है.
क्या करे बेचारा - Global warming की मार के बाद जो भी नमीं बची रह गयी होगी वो अपने Boss की "जड़" को शितल करने में सुखा दिया होगा.
कोई आश्चर्य की बात नहीं वो उन्ही क पदोन्नति क्यू करता है जो सामूहिक रूप से अब उसकी "जड़" को शितल करने में लगे हुए हैं.

मै तो अभी भी अपनी नमी दादाजी के कहे अनुसार खर्च करता हूँ.

Sunday, April 12, 2009

चाँद की खामोशी


चाँद खामोश क्यों है इतना,
क्या वो सागर की लहरों में खो गया है ?
काश कोई बदल आ जाता, दोनों के बिच में,
मुझे मेरे चाँद की आवाज़ मिल जाती |

बादल भी क्या आया,आते ही बरस गया.
वो भी चाँद के साथ सागर में खो गया |
चाँद तो फ़िर भी वहीं है, 
लेकिन कमबख्त बादल, वो तो सागर का ही हो गया | 

हलाकि, बादल बह गया है सागर की लहरों में,
लेकिन इंतज़ार है मुझे, सुरज की गरम किरणों का | 
ताकि आ जाए वो ( बादल ) ऊपर,
और ढंक ले मेरे चाँद को |